कैलाशनाथ मन्दिर : भारतीय स्थापत्य का चर्मोत्कर्ष

महल के गवाक्षों से बाहर देखते हुए कृष्ण अपने संघर्ष के दिनों को याद कर रहे थे तथा अग्रमहिषी को दन्तिदुर्ग की महानता और राज्य को व्यवस्थित करने के उनके प्रयासों का विवरण दे रहे थे। बात ही बात में उन्हें अपने चाचा के उस प्रण की याद आईं की वो अपने जीवन में एक भव्य देवालय की स्थापना करना चाहते थे..जो अबतक अपूर्ण था। अग्रमहिषी इस बात को सहन नही कर पाई की उनका तेजस्वी पति अपने स्वजन के इस जीवन स्वप्न को अबतक टालता आ रहा है, उन्होंने प्रतिज्ञा की कि "जबतक एक भव्य देवालय के कलश को न देख लेंगी अन्न जल उनके लिये त्याज्य होगा।" कलश किसी देवालय का सबसे ऊपरी भाग होता है जो सबसे अंतिम में विधिवत अनुष्ठान द्वारा स्थापित किया जाता है फिर मन्दिर स्थापत्य के अन्य भाग अपने निर्माण शैली के अनुरूप उसके नीचे व्यवस्थित रहते है।
वैसे एक सामान्य स्थापत्य निर्माण में भी पांच से छः साल लग जाते और राज वैभव के अनुकूल निर्माण करने पर कमसेकम बीस साल..आसान शब्दों में अग्रमहिषी का मृत्युवरण तय था। राज्य में शोक व्याप्त हो गया,मन्त्रालय में सभी प्रबुद्ध मंत्रियों ने गहन विमर्श किया , राज्य के सर्वोत्तम वास्तुविदों को बुलाया गया अन्ततः 'अतिलि' नाम के वास्तुविद को सभा में निमन्त्रित किया गया। अग्रमहिषी को अन्न त्यागे दो दिवस हो चुके थे और अब कृष्ण भी विचलित होने लगे..अतिलि को एक योजना सूझी जिससे रानी के प्राण बच सके।
एक निश्चित स्थान चुन कर उन्होंने मन्दिर निर्माण शुरू किया परन्तु निर्माण से पहले उन्होंने कृष्ण से प्रतिज्ञा करवाई की वो रानी को कलश दूर से ही देखने देंगे..कृष्ण मान गए। अगले दिन प्रातः उन्होंने एक चट्टान से अग्रमहिषी को मन्दिर का कलश दिखा दिया और उनके प्राण बच गये।
हर्षित कृष्ण ने जब मन्दिर को समीप से देखा तो आश्चर्यचकित रह गए की एक बड़े से शिलाखण्ड पर ऊपर कलश का निर्माण हुआ है अर्थात मन्दिर जो सामान्यतः नीचे से ऊपर बनाये जाते थे, इस शैली को छोड़ ये मन्दिर ऊपर से नीचे बनाया जा रहा था जो अपने आप में एक अनूठा प्रयोग था..कृष्ण ने मन्दिर को पूर्ण करने की जिम्मेदारी अतिलि को दे दिया और सालो बाद एक भव्य देवालय निर्मित हुआ जो सबसे विलक्षण था।  मन्दिर निर्माण को सरलता से समझने के लिए कल्पना कीजिये की किसी पूर्ण निर्मित स्थापत्य को रेत से ढक दिया जाए और ऊपर से रेत हटाते हुए नीचे आया जाए..इस तरह धीरे धीरे मन्दिर बाहर आता जाएगा..कैलाशनाथ मन्दिर के निर्माण में यही शैली प्रयुक्त है और आश्चर्य यह की केवल एक ही शिला खण्ड को तराश कर..यह कृति बिना किसी गारे और जोड़ की बनी है।

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित कैलाशनाथ मन्दिर ने मुझे हमेशा से आकर्षित किया है और मुझे यहाँ निकट भविष्य में जाने की तीव्र इच्छा है बहरहाल यह अपनी तरह का इकलौता मन्दिर है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में नन्दी है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हैं। भारतीय वास्तु-शिल्प के कौशल का अद्भुत नमूना है।
परन्तु आश्चर्य और विडम्बना की बात तो यह है की इतिहास में रुचि रखने वाले सुधीजन और विद्यार्थियों को छोड़ दिया जाए तो इस मन्दिर के विषय में सामान्य जनमानस उदासीन सा है,भारतीय स्थापत्य का विश्व में कोई जोड़ नही है यह ध्रुव सत्य है चाहे वह सैन्धव स्थापत्यगत अवशेष हो, मौर्य, शुंग,सातवाहन,गुप्त, या उत्तर गुप्त व पूर्व मध्यकालीन स्थापत्य, सब स्वयं में विलक्षण और पूर्ण..पुस्तकें विदेशी विचारों से भरी पड़ी है की भारत में जो श्रेष्ठ है वो आयातित ही है भले वो लेखन हो, स्थापत्य हो या दर्शन जबकि भारतीय परम्परा कभी किसी नाभिकीय क्षेत्र में सीमित नही रही यह पूरे महाद्वीप में विद्यमान है उदाहरणस्वरूप कम्बोडिया का मन्दिर समूह को ही देख लीजिये,नित नए भारतीय धार्मिक स्थापत्य और मूर्तियां भारतभूमि से सुदूर मिलती रहती है।
कैलाशनाथ जैसे अनगिनत कलाकृतियों से परिपूर्ण यह भारत भूमि अपने ही लोगों से उपेक्षित होती जा रही है

                     ✍️©~बिसाल

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